Thursday, 16 April 2020

आजोळ पेंडसे, नारायण पेठ, पुणे.


अ)       *निळकंठ रघुनाथ पेंडसे 
             सौ. गंगाबाई निळकंठ पेंडसे

आ)       **प्रभाकर  १४.०१.२८
             सुनंदा प्रभाकर पेंडसे
           **शांता (घाणेकर)  
          **पांडुरंग २२.०३.३३
              सुलभा पांडुरंग पेंडसेट
          **रघुनाथ ०६.०१.३४
            सुषमा रघुनाथ पेंडसे
          **गोविंद   ०२.०९.३६  
           सुनिता गोविंद पेंडसे  
          **लीला (खाडिलकर)          
टठठ
सौ. सुनिता, सौ. सुनंदा, सौ. प्रेमा, सौ. सुलभा,सौ. सुषमा (डावीकडुन)
ठठसै. शांता, सौ. प्रेमा, सौ. लीला (डावीकडुन)
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ठ

आ) प्रभाकर पेंडसे
ई)*सतिश           *गिरीष             *अश्विनी
  २३.१०.६१        ०८०७.६४     २८.१०.७२
स्नेहल                 नीना              रवींद्र महाजन
०८.११.६७         १४.१२.६९      २३.०३.६९
इ)**शारंग         **नमीता        **शाल्मली   
 २८.०९.९२     ३१.०७.९७          ०२.११.९७
  ऋतुजा           श्रीश           ** अभिषेक
 २४.०२.९६      सायगावकर   १५.०४.२००३
                        ०३.०७.९२         
सौ.स्नेहल, शारंग आणि सतिश पेंडसे
शारंंग आणि ऋतुजाठ
टट
गिरीष आणि सौ. नीना पेेंडसे
ठश्रीश सायगावकर आणि सौ.नमिता
अभिषेक, रवींद्र, सौ.अश्विनी, शाल्मली महाजन परिवार
आ) शांता - भालचंद्र  घाणेकर १९.०९.२१
ई)*दिलीप                * दिपक          * प्रदिप
०५.०७.५०            १८.०९.५४       ०५.०७.५६ 
विद्या                        छाया               शिला
२७.०३.५६            ०७.०४.६१       १३.०८.६३
इ)**गौरी                 **लीना           **प्रांजली
२१.०१.७९            ०४.०४.८४        १३.०२.८८
अनिरूद्ध पाठक     प्रविण सोहनी        सुमित नेने
०२.११.७४            १०.०९.८०          १९.०८.८६
उ) प्रणव                  वल्लरी               सुमुख
१७.०३.२००३       ०४.०४.१४      ०२.०९.२०१८
**गायत्री                **पूर्वा
१२.०९.८१             ०२.१२.८८औ
सचिन मढिकर          पराग पतंगे
०४.१२.७४              ०९.०४.९०
उ) ईशान
२५.०३.२००४
प्रदिप, दिपक आणि दिलीप (डावीकडून)

दिपक, प्रदिप, दिलीप (डावीकडुन मागचे)
सौ. छाया, भालचंद्र, सौ. शांता, सौ. विद्या(डावीकडुन) गौरी, गायत्री (खाली)

अनिरूद्ध, प्रविण, सुमित, सचिन, पराग,
सौ.पूर्वा, सौ.गायत्री, सौ.लीना, सौ.प्रांजली, सौ.गौरी (डावीकडुन मागचे)
प्रदिप, दिपक, सौ.छाया, सौ.शिला (बसलेले)
ईशान व प्रणव (खाली)
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आ) पांडुरंग पेंडसे
ई)*शिरीष
११.०२.६६
सुजाता
१५.०५.७४
इ)**सिद्धी          सर्वेश
२७.०१.९७        ००.०५.२००३
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आ) रघुनाथ पेंडसे
ई)*शुभांगी                        *जितेंद्र
०८.१२.६५                      ०९.०६.७४
विनीत नित्सुरे                   निवेदिता
०५.१२.६१                     २४.०४.७४
इ)**निहारीका                 **रीतु
 ०८.०८.९३                 १२.०३.२००१
**नचिकेत
२७.०५.८९
सौ. निवेेेदिता आणि जितेेंद्र
रीतु व सौ. निवेेदिता
विनीत व सौ. शुुभांगी नित्सुरे
नचिकेत
निहारीका

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आ) गोविंद पेंडसे
ई)* रोहिणी                 *स्वाती            *महेश
  १५.०७.६७              ३०.०१.७१   १९.१०.७६
अविनाश फडके         अमर चव्हाण
    ०५.०९.६३            ०६.१०.६८
इ)**मधु रा                 **रोहित     
१७.०१.८९                   २४.०१.९३
शार्दुल पांडे                   सायली
  ०४.०३.८८              १२.१०.९३
उ) विवान
   २०. ०२. २५

गोविंद ऊर्फ शरद आणि सौ. सुनिता पेंडसे

चव्हाण परिवार- रोहित, अमर, सौ. स्वाती, सौ. सायली (डावीकडुन)
सौ. रोहीणी, शार्दुल, सौ. मधुरा, अविनाश (डावीकडुन)

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आ) लीला (मालती)- माधवराव खाडीलकर 
ई)*मिलींद                            *मंजिरी
३०.०५.६४                        १६.११.६९
मानसी                                 नितीन जोशी
१२.०६.६५                           २१.०८.६२
इ)**अनिषा                        **अनिकेत
२९.०५.९५                           ०४.०५.९०
अमिया                                  अक्षया      
२९.०५.२०००                       ०२.०५.९२  
                                              अमेय
                                          १४.०८.९३
                                             आकांक्षा
                                            १९.१०.९३
                                            उ) आनय
                                           २२.०३.२२
                                         ऊ ) रिशांक 
                                              ०४. ०५. २३

                                            
सौ.लीला, माधवराव खाडीलकर

अनिषा, अमिया, मिलींद, सौ.मानसी
सौ. आकांक्षा, सौ. अक्षया, अनिकेत, अमेय, सौ. मंजिरी, नितीन, 
चि. आनय अनिकेत जोशी
चि. रिशांक अमेय जोशी
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आ) प्रेमा - ऊल्हासराव गाडगीळ ३०.०७.४२
ऊज्वला १जानेवारी १९५०
ई)* सचिन                          *कौस्तुभ
१८.०७.७३                          ०१.०१.८०
यशोधरा                              प्रीती
१०.०८.७८                         २५.०६.८१
इ)**तन्वी                            **सिद्धार्थ
११.०३.२००१                     ०८.०१.२०१०
सौ. प्रीती, कौस्तुभ, सिद्धार्थ, सचिन, सौ. यशोधरा, तन्वी, ऊल्हासराव, सौ. ऊज्वला (डावीकडुन)
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जन्मतारखा महिन्याप्रमाणे
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जानेवारी


ऊज्वला गाडगीळ - ०१ जानेवारी  १९५० (प्रेमा)
कौस्तुभ गाडगीळ - ०१ जानेवारी १९८०
रघुनाथ पेंडसे - ०६ जानेवारी ३४ (बाळुमामा)
सिद्धार्थ गाडगीळ - ०८ जानेवारी २०१०
प्रभाकर पेंडसे - १४ जानेवारी २८ (भाऊमामा)
मधुरा पांडे- १७ जानेवारी १९८९
गौरी पाठक - २१ जानेवारी १९७९
 रोहित चव्हाण - २४ जानेवारी १९९३
सिद्धी पेंडसे - २७ जानेवारी १९९७
अनघा चव्हाण - ३० जानेवारी १९७१ (स्वाती)

फेब्रुवारी
प्रांजली नेने - १३ फेब्रुवारी १९८८
शिरीष पेंडसे - ११ फेब्रुवारी १९६६
ऋतुजा - २४ फेब्रुवारी १९९६
विवान पांडे - २० फेब्रुवारी २०२५

मार्च
शार्दुल पांडे - ४ मार्च १९८८
तन्वी गाडगीळ - ११ मार्च २००१
रीतु पेंडसे - १२ मार्च २००१
प्रणव पाठक - १७ मार्च २००३
पांडुरंग पेंडसे - २२ मार्च ३३ (पांडुमामा)
आनय अनिकेत जोशी - २२ मार्च २०२२
रवी महाजन - २३ मार्च १९६९
ईशान मढीकर - २५ मार्च २००४
विद्या घाणेकर - २७ मार्च १९५६

एप्रिल
वल्लरी सोहनी ४ एप्रिल २०१४
नेत्रा सोहनी - ४ एप्रिल १९८४ (लीना)
छाया घाणेकर - ७ एप्रिल १९६१
पराग पतंगे - ९ एप्रिल १९९०
अभिषेक महाजन - १५ एप्रिल २००३
निवेदिता पेंडसे - २४ एप्रिल १९७४

मे
अक्षया अनिकेत जोशी २ मे १९९२
अनिकेत जोशी ०४ मे १९९०
रिशांक जोशी ०४ मे २०२३
सुजाता पेंडसे - १५ मे १९७४
नचिकेत नित्सुरे - २७ मे १९८९
अनिषा खाडीलकर - २९ मे १९९५
अमिया खाडीलकर - २९ मे २०००
मिलींद खाडीलकर - ३० मे १९६४
सर्वेश  पेंडसे - ०० मे  २००३

जुन
जितेंद्र पेंडसे - ०९ जुन १९७४
मानसी खाडीलकर - १२ जुन १९६५
प्रीती गाडगीळ - २५ जुन १९८१
 
जुलै
श्रीश सायगावकर - ३ जुलै १९९२
दिलीप घाणेकर - ५ जुलै १९५०
प्रदिप घाणेकर - ५ जुलै १९५६
गिरीष पेंडसे - ८ जुलै १९६४
रोहिणी फडके - १५ जुलै १९६७
सचिन गाडगीळ - १८  जुलै १९७३
ऊल्हासराव गाडगीळ ३०  जुलै १९४२
नमिता पेंडसे - ३१ जुलै १९९७

ऑगस्ट
निहारीका नित्सुरे - ०८ ऑगस्ट १९९३
यशोधरा गाडगीळ - १० ऑगस्ट १९७८
शिला घाणेकर - १३ ऑगस्ट १९६३
अमेय जोशी - १४ ऑगस्ट १९९३
सुमित नेने - १९ ऑगस्ट १९८६
नितीन जोशी - २१ ऑगस्ट १९६२


सप्टेंबर
गोविंद पेंडसे - ०२ सप्टेंबर ३६ (शरूमामा)
सुमुख नेने - २ सप्टेंबर २०१८
अविनाश फडके - ५ सप्टेंबर १९६३
प्रविण सोहनी - १० सप्टेंबर १९८०
गायत्री मढीकर - १२ सप्टेंबर १९८१
शारंग पेंडसे -  २८ सप्टेंबर १९९२


ऑक्टोबर
अमर चव्हाण - ०६ ऑक्टोबर १९६८
सायली चव्हाण - १२ ऑक्टोबर १९९३
महेश पेंडसे - १९ ऑक्टोबर १९७६
आकांक्षा अमेय जोशी - १९ ऑक्टोबर  १९९३
सतिश पेंडसे - २३ ऑक्टोबर  १९६१
अश्विनी महाजन - २८ ऑक्टोबर १९७२

नोव्हेंबर
शाल्मली महाजन - ०२ नोव्हेंबर १९९७
अनिरूद्ध पाठक - ०२ नोव्हेंबर १९७४
स्नेहल पेंडसे - ८ नोव्हेंबर १९६७
नेहा जोशी - १६ नोव्हेंबर १९६९ (मंजिरी) 
 
डिसेंबर
पूर्वा पतंगे - २  डिसेंबर १९८८
सचिन मढीकर - ४डिसेंबर १९७४
विनीत नित्सुरे - ५ डिसेंबर १९६१
शुभांगी नित्सुरे - ८ डिसेंबर १९६५
नीना पेंडसे - १४  डिसेंबर १९६९


ओळखा कोण कोण आहे?




Friday, 7 February 2020

आवड रांगोळीची

कोल्हापुरची
इस मूर्ति की लंबाई 4 फीट है और यह करीब 7,000 वर्ष पुरानी है। मंदिर में एक दीवार पर 'श्री यंत्र’ उकेरा गया है। एक पत्थर का शेर (देवी का वाहन), मूर्ति के पीछे खड़ा है। देवी के मुकुट में भगवान विष्णु के शेषनाग की एक छवि है। महालक्ष्मी के चार हाथों में उनके प्रतीक चिन्ह हैं। निचले दाहिने हाथ में एक मुलिंगुला (एक खट्टा फल) है, ऊपरी दाहिने हिस्से में एक बड़ी गदा है, जिसे कौमोदकी कहा जाता है,  ऊपरी बाएँ हाथ में एक ढाल या खेतका और निचले बाएँ हाथ में पानपात्र है।  

वणीची
माहुरची
साडेतीन शक्तीपिठं
अष्टविनायक
आनंद

Thursday, 21 November 2019

गिरनार यात्रा

"गिरनार यात्रा - अविस्मरणीय अनुभुती"
(वैकुंठ चतुर्दशी -त्रिपुरी पौर्णिमा )
(९ नोव्हेंबर ते १२ नोव्हेंबर २०१९)

साधारणपणे एक वर्षांपूर्वी मनात श्री क्षेत्र गिरनार दत्त पादुका दर्शनाची ईच्छा झाली. मी दिर , जाऊ व नवरा याना ती बोलून दाखवली. मागच्याच वर्षी जाण्याचा योग त्यांचा होता. मी मुलाच्या दहावी मुळे नाही म्हटले. तेव्हाच यावर्षी जायचं ठरवलं. बरोबर वर्षांनी कार्तिकी पौर्णिमेच्या आदल्या दिवशी योग आला. दत्तमहाराजांनीच तो घडवुन आणला. मागच वर्ष कुठंतरी मनात यंदा दर्शन घडवा  प्रभू हाच जप सुरु होता.  कामावर जाताना  एक बलभीम मंदिर लागतं, रोज मला शक्ती दे अस आपसुखच म्हटलं जात होतं. जाऊन आलेल्यांचे अनुभव विचारण्याचा जणु  नादच  लागला होता. 

आणि तो दिवस ९-नोव्हेंबर-२०१९ उजाडला. डेक्कन एक्सप्रेसने मी आणि नवरा दुपारी ३ . १५ ला ठाण्याला जायला निघालो. प्रवासाचा पहिला टप्पा सुरु झाला. नागपूरहुन नणंद आधीच ठाण्याला आली होती. पाच जणं ठाण्याला एकत्र जमलो. दीर, जाऊ, नणंद, नवरा आणि मी. जावेनं छान जेवू घातलं . प्रसादाचा शिरा खाल्ला. सामान, तिकीट वगैरेंच्या गप्पा  झाल्या. जय गिरिनारी म्हणत  एकमेकांचा उत्साह वाढवत मस्त सेल्फि झाला.  रात्री १० वाजता टीम गिरिनार निघाली. ठाण्याहुन दादर ला लोकल ने गेलो. लोकल पकडताना, प्लॅटफॉर्म बदलतांना झालेले धावपळ, गंमत, हसून हसून पुरेवाट झाली होती. दादर  ते सेंट्रल परत लोकल प्रवास. सेंट्रल हुन राजकोट ची दुरांतो रात्री ११ वाजता होती. आतुरता, विश्वास, श्रद्धा, ओढ, अश्याने तुडुंब भरलेली मन गाडीत स्थिरावली. 


सकाळी १०. ५५ ला राजकोट येणार स्टेशन होतं. ९.०० वाजता गाडीतच पराठा, चिवडा, चकली, नाश्ता झाला. दत्तकृपेने दुरांतो मधे छान चहा सुद्धा मिळाला. राजकोट ला गाडी १०.२० ला म्हणजे बिफोरे टाइम पोचल्याने छान वाटत होते. स्टेशन स्वच्छ छान होते. हवा पण फार गरम नाही , फार थंड नाही अशी होती. राजकोट ला दिराचे एक स्नेही असतात. त्यांच्यामुळे राजकोट ते जुनागड गाडी ची सोया झाली. स्टेशन वर चहा घेऊन तात्काळ जुनागड कडे रवाना झालो. 

राजकोट  शहर  रविवार असल्याने शांत होते. थोड्यावेळाने ईदची तयारी - जुलूस, अन्नछत्रे रस्त्यात दिसत होती. नटून थटुन  लोकं  दिसत होती.  मोठंमोठ्या भांड्यात अन्न  शिजत होतं.  ठिकठिकाणी  केकचे स्टॉल होते.  मज्जा आली बघायला. जाताना वीरपूर आणि जेधापूर लागले.  भरपूर  शेती - विविध झाडं कशाची? यावर चर्चा सुरु झाली . पार पांढुर्णा गावात मंडळी पोचली. बंधेजची फॅक्टरी ची कामं  दिसली. अचानक पुसटसा डोंगर कडा दिसला आणि ज्याचा ध्यास घेतलेला,  ज्याची आस आतुरता होती तोच  पवित्र श्री गिरनार पर्वत प्रथम दर्शन देत होता. डोळे विस्फारून आम्ही पाहात होतो. हळुहळू तो जवळ येत होता. मनात चलबिचल सुरु होती. दोन तासात आम्ही जुनागढला पोचलो. कमानीतुन आत जाण्यास प्रायव्हेट वाहनांना मज्जाव होता. दोघा भावांनी  टमटम शोधली. सामानासकट आम्ही गडगडाट टमटम मध्ये चढलो.  एका पोलिसाला विनंती करून अमर पराठा लॉज पर्यंत नेण्याची परवानगी घेतली.  चला उतरा  आपलं ठिकाण  आलं  - दीर म्हटले. उतरून समोर पाहते  तर डोळ्याच्या याकडेपासून त्या कडेपर्यंत गिरनारचा विस्तार  होता. जत्रा असल्यानं रस्ता शृंगारल्या सारखा नटलेला वाटत होता. जागा वेगळी  भाषा वेगळी माणसे वेगळी पण तरीही आपलेपणा वाटत होता.  तिसरा मजला गाठला. सामान ठेवलं. आंघोळी आटोपल्या. जो आवरून होईल तो गॅलरीतून गिरनार पाहत होता.  रस्ता पाहत होता. सर्वत्र चैतन्यमय वातावरण होतं. 


आवरून खाली उतरलो. जवळच असलेल्या नरसी मेहता धर्मशाळेत गेलो. पाचच मिनिटं अंतरावर होती ती. सात्विक-घरगुती अस जेवण जेवलो. (घराची आठवण झाली. ) आजूबाजूस चढून व जाणारे बघुनच ओळखू लागलो. आपण कसे दिसणार आहोत उद्या याचा अंदाज पण आला. गंमत अपार्ट पण छान वाटलं. रात्री इकडेच हलकीच खिचडी कढी खाऊन चढण सुरु करू अस ठरलं. रूमवर गेलो. तास दोन तास आराम करून मग सामान भरू असा विचार होता. सगळ्यांनाच झोप लागली अस नाही. चार वाजले. चहा खालीच जाऊन प्यायचा म्हणून आवरून निघालो. अजून पोट जड होत. रात्री जेवूच नये ठरलं.

 दोनदा चहा घेतला आणि दादाच्या म्हणण्यानुसार काश्मिरी बापू आश्रम पाहून येऊ असच ठरलं. ते पण आधी गेले नसल्यानं शोधतच जावं  लागणार होत. जितक्या सहजतेने आम्ही  तिघी जाऊन येऊ म्हटलो  तितक्याच  शंकेमुळे  जावं कि नाही द्विधा वाटू लागलं होत. याच कारण अंधारातला जंगलातला माहित नसलेला रास्ता. परंतु दोघा भावांनी उचल खाल्ली आणि काळजी करू नका, मोबाईलचा टॉर्च  लावु आणि जाऊ म्हटलं. मग एकमतानं निघालो. यात दत्तमहाराजांनी आम्हाला वॉर्म अप घडवला. अंधारातली पायवाट, घनदाट झाडी, झरना, पाणी, डबकी, आवाज अशात मधे  मधे भेटणारे वाटसरू दिलासा देत होते. साधारणपणे ३-४  किलोमीटर  नंतर घंटानाद ऐकू आला. तोवर आमची रामरक्षा, भीमरूपी, रामाचं अष्टक म्हणून झाली होती.  महाराजांची कृपादृष्टी असेल तर काळजीचं  कारणच नसतं. आश्रम आलं. पायऱ्या चढून वर गेलो. तोच समोरून दिशा दाखवत दोघे आले. आम्हाला काश्मिरी बापू याचे दर्शन घडवले. त्यांना नमस्कार करताना खरं सांगते आपसूखच डोळे वाहू लागले. ते थोडे दूर बसले होते. दोन हात उंचावून आशीर्वाद दिले. तिकडून पुढे मोठी पडवी होती.  तेजस्वी चेहऱ्याच्या अशा केशरी वस्त्र परिधान करून त्यांच्या  शिष्या  जपमाळ करत होत्या. आनंदी हसतमुख चेहरा आम्हाला आशीर्वाद देत होता. त्यांच्या जवळच्या बाईंना त्यांनी आम्हास जेवणाची खुण केली. मँगो बाईटची गोळी प्रसाद म्हणून दिली. मागच्या अंगणात  ताडपत्रीचा मांडव होता. उंच सखल टोकेरी दगड अशीच ती जमीन होती.  त्यावर निळी ताडपत्री होती.  प्रसाद म्हणून वरण, भात, भाजी, पोळी ताटात होती. चवदार जेवण जेवलो. जणु काही महाराज म्हणत होते कि पोटभर जेवा आणि मग या वर. आज आम्हा सर्वांचे ग्रह फारच प्रबळ झाले असावेत. शांत मनानं  ती प्रसादाची गोळी खात, दत्तगुरूंच्या नामाचा जप करत परत  कधी  पोचलो कळलंच नाही. आश्चर्यच वाटलं दीड तासात आपण जाऊन आलो सुद्धा. का कोण जाणे आता आधी पेक्षा जास्त धीर वाटत होता. रूमवर जाताना रघुनाथ द्वार भवनात देवळा जवळ काठ्या खरेदी झाली. लंगर सुरु होता तिकडे ताक पिऊन खोलीत गेलो.

आपापल्या जवळ सामान कस कोणी घ्यायच ते घेतलं. बुट चढवले, काठ्या पकडल्या आणि स्वतःस श्रीदत्तगुरुना स्वाधीन करून आम्ही लंबे हनुमान देवळात पोचलो. या देवळात हनुमानास नमस्कार करून चढण्यासाठी बळ व शक्ती दे म्हणून पुढे जाण्याची प्रथा आहे. नारळ फोडला, भिमरूपी म्हणुन निघालो. पुढे कमान  आहे व पायऱ्या सुरु होतात. चौकात चढावाव मारुतीच सुरेख  देऊळ आहे. पहिल्या पायरीची पूजा आरती करून, मनोभावे नमस्कार करून, स्वतःस श्रद्धेने श्रीदत्तगुरुंचा स्वाधीन करून चढायला सुरवात केली. एका लाईन मध्ये धीमे धीमे चाल सुरु केली. आजुबाजुस पाणी,  लिम्लेटच्या गोळ्या, ताक, सरबतं अशी दुकाने होती. सुरवातीच्या काही पायऱ्यांवर आकडे आहेत. ५० पायऱ्या झपकन झाल्या. प्रवास सुखकर होवो असे शुभेच्छांचे दोन फोन येऊन गेले. साधारणपणे १०:४५  ला रात्री आम्ही चढणं सुरु केले. नामस्मरणाचे विविध ताल ऐकत चालत चालत २५० पायऱ्या आल्या. आता घामानं डोकं काढलं होत. श्वासाचा जोर वाढला होता. वहिनींनी भीमसेनी कापराचा तुकडा जवळ ठेवण्यास दिला. अजुनही आम्ही वस्तीतच होतो असं वाटत होता. जय गिरनारी, अवधूत चिंतन श्रीगुरुदेवदत्त, गुरूदेव दत्त असं म्हणत चढत होतो. ५०० व्या पायरी पर्यंत पोचलो. मांड्या, पोटऱ्या जाणवु लागल्या परंतु त्रास त्रागा वाटत नव्हंता . आता ठराविक पायऱ्यांवर आकडे आहेत. वर्दळही खुप होती. डोली वाले पाहुन तर काटाच येत होता. त्यांची कमालच  आहे. म्हणता-म्हणता १००१  पायरी गाठली. वरून जुनागड, गिरनार पायथा दिव्यांची झगमगाट  दिसू लागली . दोनतीन फोटो झाले. ठराविक अंतरान एक दोन मिनीटं उभा राहत होतो. काठीची कमाल जाणवत होती. काठी म्हणजे प्रत्यक्ष दत्तमहाराजच हात देत आहेत असं वाटत होता. आता पायऱ्या लगेच जास्त होत्या तसाच कातळ दगड सुरु झाला. गारवा वाटत होता. पण तो आल्लाहदायक होता. आम्ही घाम  पुसत होतो.

अबब!! ३००० पायऱ्या झाल्या. विश्वासच बसेना. अंबामाता देऊळाजवळ  थोडं थांबु असं दादा म्हणाले . अजुन २५०० पायरी नंतर ते होतं. आधी नेमीनाथांचं देऊळ आलं. बांधकामाचं सामान पडला होतं. चढताना बरेचजण पुण्याचे ओळखीचे झाले . चढताना कोणीच बोलत  नसे .  दम खायला थांबलं कि बोलणं होत असे . नंतर जरा उतारांच्या पायर्यांचच वळण वाढतं. जैन मंदिराजवळ पोचण्या आधी (थोडंसच) मारुतीचा देऊळ लागतं. चौथरा पांढऱ्या फारश्यांनी भरला होता. तिकडे बसलो पाठ पाच मिनीट टेकु म्हणून बसल्या बसल्या मागे झुकलो. काही जण पाय सरळ करून बसलो. इतक्यात भरभरा  बोचरा वर सुरु झाला. अचानक गारठा वाढला. जस जस वर जातो तस तस गारठा जाणवतो. १०-१५ मिनटात इकडून निघालो . गडावर दरवाजे असतात तसे दरवाजे होते.  घुssघुss वारा होता. आत गेलो तर गार  पाण्याचा स्टॉल , हसतमुख ती माणसं पाणी प्या ताजे व्हा वर जा असा म्हणत होती . ती जागा जैन मंदिर होती. अंबाजी देवळाची वाट आता सुरू झाली. वाटेत लहान लहान देवळं आहेत. गुफा आहे बाबाजी महाराजांची. रामाचं देऊळ आहे. या सर्व ठिकाणी परतताना थांबायचं ठरल आणि ६००० पायरीला नंतर अंबाजी देऊळ आलं . आता वरून दूरवर पर्यंत दिवे दिसत नव्हते.  देऊळ बंद होत . सकाळी पाच वाजता दर्शन घेऊ शकणार होतो. वाटेत बरेच वेळा - झाल निम्मच आहे, चालत रहा पोचाल अस म्हणणारे ऊत्साह वाढवत होते.

'तिसरा टुंक आ गया' असा कोणतरी म्हटलं. पुढे दोन्ही बाजूला दरी  मध्ये रस्ता  कधी सपाट तर कधी पायरी असा होता. कुट्ट अंधार होता. आता होते ते फक्त काट्यांचे ठक ठक आवाज. अंबाजी माता डोंगर ते गोरक्षनाथ डोंगर पायऱ्यांनी डोंगराच्या टोकावरून जोडले आहेत. चढताना फारस वाटलं नाही परंतु उतरताना वाटलं. ... आश्चर्य वाटलं. .. इकडून आलो आपण! उताराच्या पायऱ्या त्यापण जास्त व तीव्र चढण अस करत गोरक्षनाथ धुनी जवळ आलो. डावीकडे नवीन मूर्ती मंदिर तर उजवीकडे गोरक्षनाथ जुनं मंदिर होत. चार पायऱ्यांनंतर डावीकडे चौकोनी तट, तटावर मधोमध छानसा घुमत त्यात गोरक्षनाथ मूर्ती (पांढरी शुभ्र) हिरवा केशरी फरशीचा वापर सजावटीत होता. समोर काळी  पाषाणाची नितळ आणि मोहक गणपतीची मूर्ती होती. भगवा फडफडत होता. गारवा असूनही उबदारपणा इकडून जाताना जाणवला. पायऱ्या किती झाल्या हा विचार इकडे येताच नाही. आपण हलकं फील करतो. परत पुढचं टुक / टोक येताना दोन्हीकडे दरी , अंधार पायऱ्यांवर लक्ष ... अंबामाता टुक नंतर एकही स्टॉल नाही. आता चंद्र हळूहळू मोठा होतोय जाणवू लागला. स्वच्छ नितळ प्रकाशात न्हाहून निघत होतो. इच्छापूर्तीच्या जवळ जवळ जात होतो. भावुक वाटण साहजिकच होतं . आता श्री दत्त पादुका टोक / टुक नजरेच्या टप्प्यात आलेलं दिसत होत. फक्त कातळ दगड अंधार . आनंदामुळे पावलांची गती वाढली. दोन कमानी आल्या. एक वर जाते ती श्री गुरु दत्त पादुका स्थळ तर एक खाली जाते. कमंडलू तीर्थ कडे. (११ नोव्हेंबर १९ पहाटे ४.३० वाजता) इतक्यात ऐकू आलं. 'अरे चालो धुनी लाग गई .. , आज सोमवार होता. सोमवारी या ठिकाणी म्हणजेच श्री गुरुदत्त यांच्या अक्षय निवास स्थानी धुनी आपोआपच प्रज्वलित होते. आम्ही आधी गुरु पादुका दर्शन घेण्याचं ठरवलं.  ब्रह्ममुहूर्तास आम्ही  पोचलो होतो. आतुरता , आनंदभाव श्रद्धापूर्ण अंतःकरणानं आम्ही चढू लागलो. सर्वात तीव्र उतारावरच्या या पायऱ्या, चंद्राचा प्रकाश आणि नामस्मरणात कसे चढलो कळलचा नाही. ५० एक पायऱ्यांवर आम्ही होतो. ज्याचा ध्यास , ओढ वर्षांपूर्वीपासून होती ते श्रीगुरु दत्त पादुका ठिकाण जवळ येत होत. हात थरथरत होते. आनंद वाचा फोडणार , अश्रूंचा आधार घेणार याची मला जाणीव होत होती. जेमतेम २० पायऱ्या उरल्या. प्रत्येक पायरीस डोकं टेकवत नमस्कार करत चढत  होते. आनंदाश्रु  मी थोपवू शकत नव्हते.पायऱ्यांवर चंद्राचा प्रकाश होता.  गुलाबदाणीच्या पाण्याचा, गावठी  गुलाबाच्या फुलांचा सुवास पायरीसही येत होता. वर पाहते तर भगवा झेंडा शुभ्र पांढऱ्या चंद्रप्रकाशात न्हाऊन निघत होता. अंगावर ते वारं , तो प्रकाश, गावठी गुलाबाच्या सुवासासकट आत जात आहे असं वाटत होतं. तो मनास शांती देणारा  वारा आरपार न जाता शरीरात मुरतोय, आत खोलवर जातोय असच वाटत होतं. ताईनी व मी घट्ट हात धरले. नजरेनंच भावना टिपल्या. परत नमस्कार करत चढु लागलो. समोर गुरु पादुका ठिकाण उजवीकडे मोठा गोल दुधाळ चंद्र वर बरोबर वर सप्तर्षी आजुबाजूस चमचम तारे आणि .... चार पायऱ्या उरल्यावर एक रेलिंग आलं. आणि तो क्षण आला त्या पावित्र्य भूमीस स्पर्श केला . जन्माचं सार्थक झालं. आत डावीकडे वळुन समोर परमेश्वर, पवित्र दत्त पादुका, मोठ्या ठसठशीत सुंदर गंध लावलेल्या मनाला भावणाऱ्या मोहकशा होत्या. पाच मिनिटात भरभरून त्या डोळ्यात साठवल्या जात होत्या. मागे गोड हसणारी श्री दत्तात्रयाची पांढरी मूर्ती होती. जवळच एक गुरुजी बसले होते. ते मराठीत बोलत होते. शाल नारळ पैसे वहिनींनी व नवर्याने दिले. प्रसाद पादुकांना टेकवून त्यांनी परत दिला. एक चुंबक आपल्याला धरून ठेवतं तस वाटत होतं. ही स्पंद, हा आनंद, अद्भुत अनुभुती आयुष्यभर कुठेही डोळे मिटले तरी आठवेल अशीच आहे. गुरू पादुकांना स्पर्श करण्यास मज्जाव आहे. दुरूनच नमस्कार करायचा. मस्त ठसठशीत पावलं सुंदर झेंडुच्या फुलांनी सजवलेली होती. जणु ते महाराजांच पायघोळ धोतरच- भगवं! हे परमेश्वर दर्शनाची ईच्छा निर्माण करणारा तूच आणि ती पुरी करण्याची शक्ती देणारा पण तुच!  परमेश्वरास समर्पण करणं याच महत्व आज मला समजलं. प्रदक्षिणा पुरी करून परत डोकं टेकुन त्या पवित्र भूमीवरून १०,००० व्या पायरीवर पाय ठेवून बाहेर पडलो. दर्शननंतरचे आनंदी चेहेरे, भारावलेली मनं घेऊन हे परमेश्वराचे मंदिर - "शरीर" घेऊन २० पायऱ्या खाली आलो. चपला बूट घातले. आता उजवीकडचा चंद्र नव्हता, तो पूर्ण अंधारात होता. परंतु डावीकडे तांबडं फुटु लागलं होत. पुसटसची लालसर रेघ नारायण येण्याची चाहूल देत होती. ते चित्र कॅमेऱ्यामध्ये टिपलं. गिरनार टीम चा पण  फोट काढला. आंतरिक समाधानी असे कायमच भक्तीच्या दोऱ्यात बांधले गेलेले आम्ही पाच मणी अनुभूतीने भारावलेले असे. त्याच भावात कमांडलु क्षेत्र कमानी जवळ पोचलो. फारसं कोणी कोणाशी बोलत नव्हतं. बारिकस हसत होतो.


आधी सारख्याच तीव्र उतारावरून कमांडलुतीर्थ ला पोचलो. सूर्यनारायण उगवताना मागे दिगंबर स्वर आणि गिरनार पर्वत खरंच खुपच सुखद होत सगळं. थोड्या थोड्या लोकांना आत सोडत होते. आत पायऱ्या उतरुन गेल कि एक मोठी खोली आहे, त्यात एका मोठ्या घमेल्यात एक फूट मोठी अशी लाकडं होती. उबदार जागा होती. आम्ही धुनीस नमस्कार करून निरीक्षण करत होतो. ती मानस एकाग्रता देते. अंगारा घेऊन पुढे गेलो. एका खोलीत पाटावर बसलो . गरम गरम शिरा प्रसाद दिला. हवा तितका मागा म्हणत प्रेमान  वाढत शिष्य फिरत होते. प्रसाद बाहेर नेण्यास मज्जाव आहे. तो खाल्ला कि एक शिष्य हातावर पाणी घालतो. पुढे तीर्थ प्राशन (पाणी पिऊन) हे बाटलीत भरून घरी नेतात . (या तिर्थीस महत्व आहे.) आता ताजे तवान वाटु लागलं होत. हा प्रसादच उतरण्याची ऊर्जा देतो म्हणतात. परत तोच उतार - तीव्र चढण झाला होतं. आता नारायणाचं छान आगमन झालेलं होत. कोवळ्या किरणांचा थाट पाहत, अंगावर झेलत परत निघालो. पाचव टुंक/टोक श्री गुरु पादुका उजेडात पाहत पाहत चालत होतो. चौथ टुंक/टोक गोरक्षनाथ पर्यंतचा रस्ता उजेडात पाहुन भारी होत. वाट उजेडात पाहताना सोनेरी किरणातला हिरवा निसर्ग धुकं झाक दिसत होत. गोरक्षनाथ देवळात दर्शन घेतलं. हे जरा ऊंचावर आहे. देवळा बाहेर फोट काढला.


आता काठी म्हणजे तिसरा पायच झाली होती. पुढे उतारावर बाकडे/ कठडे होते. तिकडं थांबलो. साधारण  सातला परत निघालो. ८:४० ला अंबाजी देवळा जवळ चहा घेतला. अंबाजी माता देवळा जवळ बॉबी बटाटा नवीन पदार्थ खाल्ला. कसा खायचा?? हा !हा !हा ! तो प्रत्येकाने आवडीचा मार्ग निवडला. "आता जैन मंदिराजवळ जमु  मागे पुढे झालो तरी." असं वहिनींनी सांगितलं. जवळ जवळ ६००० पायऱ्या उतरण  शिल्लक होत. श्रद्धेनं विश्वासानं मनं मजबुत झाली होती. त्यात काठी होतीच. पायऱ्या ऊतरताना आपण रात्री काय रास्ता चढलोय याची कल्पना येत होती. साधारपणे ४००० पायरीच्या जवळ थांबलो. एक एक जण नजरेच्या टप्प्यात  पुढे सरकत होतो. उतरताना एक  दोन फोटो काढले. परतीच्या वाटेवर  घड्याळावर  लक्ष नव्हतं,   लक्ष  होतं ते पुढच्या पायरीवर. फक्त पायरी फोकस होता. जवळजवळ ३००० पायऱ्या उरल्या असतील  तेव्हा जाणवलं की ऊन वाढतंय. बरं झालं रात्री चढलो. मधेच  चढणारे लोक आम्हाला विचारात त्यांना आम्ही बक अप करत होतो. अनेक अपंग, अतिवृद्ध, बालकं सगळे चढत होते. जुनागढ रहिवासी जास्त करून अंबाजी देवळापर्यंत जातात. पुढच्या ४००० पायर्यांवर महाराष्टीरन लोक जे श्रीगुरूदत्त पादुका दर्शनाच्या ध्यासानं आलेत ते दिसतात. २७०१ पायरीवर आकडा दिसला तेव्हा मी बाकडा पकडला. १० मिनीटं वाट पाहिली. मंडळी दिसेचना. फोन लागेना. तेवढ्यात एक भडजी ग्रुप आला. "ऊठो जय गिरनारी बोलो, हो जाएगा" नारा होता. एकदम संचारल्या सारखं झालं आणि त्यांच्यात चालु लागले. वरती - मागे गुलाबी रंगावरून वहिनी व पांढरा रंग नवरा  ओळखु येत होते. तेवढच समाधान. अचानक ठिकठिकाणी लोक माकडांना खाऊ घालत आढळले. दोन तीव्र वळणं ऊतरले तर वाळका पाला पाचोळा ऊडावा तशी माकडांची सेना ऊजवीकडुन डावीकडे धावली. त्यात मी ५० तरी पायरी धाडधाड ऊतरले असेन. नवर्याचा फोन आला. पहिल्या पायरीशी थांबते बोलणं झालं. तेव्हा १९००  व्या पायरीशी होते. त्यावेळी जे सुचत होतं ते केलं. मधे वहिनी दादा थांबले, ताक घेतलं. तरतरीत झाले. नणंद व नवरा जवळच होते. ऊतरताना गुडघ्यांची कमाल असते. एरवी या अवयवाकडे आपण दुर्लक्ष करतो. शरीराची काळजी घ्या असच परमेश्वर सुचवतात. ६५० पायर्यया ऊरल्या तेव्हा पाय ऊभं राहिलं की डगडगत होते. पण चालत राहिलं की टकाटक. शेवटच्या ६५० पायर्या पुन्हा गुरूदेव दत्त म्हणतच खाली ऊतरलो. दैवी जाणिवेतुन परत मानवी जाणिवेत जाताना हे होणारच होतं. चढावाव मारूती जवळ येऊन पोचलो. आनंद गगनात मावेना. नणंदा भावजया भावुक झालो.आम्ही चक्क मिठीच मारली. परमेश्वर कृपेनं काय साद्ध्य झालय यावर विश्वासच बसत नव्हता. पोटभर पाणी प्यायलो. दुपारचे १२. ३० वाजले होते. पहिले बुट काढले. पाय मोकळे केले. नवय्याने मालिशवाल्याकडुन  पायाला मालिश करून घेतली. आम्हाला करायची होती पण आडोसा नव्हता. परत लंबे हनुमान मंदिराजवळ नारळ फोडला. यात्रा सफल झाली. त्याचे आभार मानले. संथ गतीनं पाचही जणांची पावलं पडत होती. मनात तेच दृष्य फ्रीज झालं होतं. नरसी मेहता धर्मशाळा गाठली. भोजन केलं. काहींनी फक्त ताक घेतलं. चुरम्याचा लाडु ताटात मिळाला. काय आनंद झाला म्हणुन सांगु. परत जत्रेत घुसलो. आता तिसरा पाय परत देण्याची वेळ आली. जड अंत:करणाने तो दिला. मागे वळुन पाहता तोच डोळाभर मावणारा पवित्र गिरनार पर्वत, पवित्र गुरू पादुका टुंक अनुभव डोळ्यात तरळला. हलके हलके पावलं रूमवर पोचली. ती प्रसन्न, अद्भुत स्पंद ऊराशी कवटाळुन गाढ झोपी गेलो ते दुपारी १. ३० वाजता.

संध्याकाळी ५ वाजताच जाग आली. बरच फ्रेश वाटत होतं. दोन तीन ठिकाणी पायाला दुखत होतं पण तीव्रता नव्हती. दोन तास यात्रा, चढणं, अनुभव यावर गप्पा झाल्या. कशी गंमत झाली? कोण कुठं मागे होतं? कोणाला काय दिसलं? वगैरे. तसच यात्रा सफल झाल्याचे फोनही झाले. त्यांना आम्ही काहीतरी ग्रेट केल अस वाटत होतं परंतु आमच्याकडून ते महाराजांनी करवुन घेतलं हे आमचं आम्हालाच समजत होतं. नंतर सामान आवरून घेतलं. दादानी चहा वर आणुन दिला. बसल्या जागी चहा मिळण्याच सुख दोन्ही भावांनी आम्हास दिलं. साधारण साडेसातला खाली ऊतरलो. आज यात्रेत फिरताना लोकाअंकडे पाहण्याचा नजरीयाॅ कालच्यापेक्षा १०० पटीनं वेगळा होता. काल आम्ही नदीकिनारी होतो, आज आम्ही नखशिखांत नदीत होतो. परत एकदा लंबे हनुमान पर्यंत गेलो. रात्री नरसी मेहता मधे जेवलो. बाकडयावर तिघी गप्पा मारत बसलो.  आज गारवा जास्त होता. अंधारात पाऊलवाटांवरचे डोंगरावरचे दिवे पाहात बसलो. चला झोपुया गारठा वाढलाय लगेचच रूमवर गेलो. (रात्रीचे १०.30) गाढ झोपी गेलो. पाच तृप्त आत्मे झोपले होते.
(१२ नोव्हेंबर १९) सकाळी सातला जाग आली. आज त्रिपुरो पौर्णिमा होती. चहा नवर्याने आणला तो घेतला. तिघीनी आधी आंघोळ आटोपुन रघुनाथद्वार भवनाथ देवळाजवळच शिवमंदिर गाठलं. मनोभावे नमस्कार केला. त्रिपुरवात लावली. आवळ्याची वात लावुन नतमस्तक झालो. वहिनींनी छानस स्तोत्र म्हटलं. जवळच तुळस होती. आमच्यासाठी योगायोगानं तीन पणत्या होत्या, वात लावायला. तुळशीजवळ दिवा लावला. आणखी एक महादेव होता, तिकडे पण आवळ्याची वात लावली. त्रिपुरी पौर्णिमा दिपोत्सवाचा योग पवित्र गिरनार भुमीवर लाभला. तिघी पण (जाऊ , नणंद आणि मी) आनंदुन गेलो. तेवढ्यात फोन आला की गाडी आलीय चला.

दादांचे स्नेही भावेनभाई यांची गाडी राजकोटला नेण्यासाठी आली होती. (सकाळी 10 वाजता) अमर पराठा मधे पापडी, फाफडा आणि अननस असा नाश्ता केला. जुनागढ सोडण्याची वेळ आली. मागे वळुन नमस्कार केला. पावलं जड झाली होती. "गिरनार - अविस्मरणिय अनुभुती" ची शिदोरी घेऊन गाडीत बसलो.

आमच्या वाहनचालकाची वाटेत असणार्या वीरपुरला जलाराम बापु देवळाची भेट घ्यावी, दर्शनाचा लाभ घ्यावाही जबरदस्त ईच्छा होती. महाराष्ट्रात जसं गजानन महाराजांना मानतात, तसं गुजरातला जलाराम बापुंना मानतात हे दर्शनानंतर समजलं. आम्ही अजाण होतो परंतु या दर्शनाचा लाभ झाला. चालकाच्या माध्यमातुन महाराजाअंनी तो आणला. प्रत्यक्ष श्रीरामचंद्रांनी श्री जलाराम बापुंना दृष्टांत दिला ती काठी व झोळी तिकडे रामाच्या देवुआत आहे. जलारामाअंचा जुना फोटो आहे. आजवर पाहिलेल्या रामाच्या मूर्तीपेक्षा ही वेगळी होती.(मिशी). वीरपुर ते राजकोट फास्ट गाडी आणली. गप्पा टप्पा करत राजकोट आलं. भावेन दादा व सौ जेवणासाठी वाट पाहत होते. छान जेवलो. दादाच ऑफिस पाहिलं.   
 तीन वाजता दादा विमान तालावर गेला. त्यांचे दिल्लीचे विमान होते. आम्ही चौघ भावेन दादांकडे थांबलो. रात्री ७  वाजता आमची गाडी असल्याने राजकोट मार्केट ला चक्कर मारण्याचा मानस सौ. भावेन वाहिनीनमुळे  उत्तम पार पडला.


बंधेज ड्रेस खरेदी झाली.  आग्रह आणि आदरातिथ्य या  श्री व सौ भावेन दादा वहिनींचा हात कोण धरू शकणार नाही. राजकोटच्या पॉट आईस्क्रिमची चव पण घेतली. पुण्याला नक्की या असा म्हणत ६ वाजता  राजकोटचा निरोप घेऊन आम्ही स्टेशनवर पोचलो. आता सामान पण वाढला होतं. वेळेवर गाडी आली आणि सुटली सुद्धा. गाडी रिकामी होती. गिरनारी  बरेच होते. अहमदाबादला गाडी भरते असं समजलं. ९.३० ला झोपायची तयारी करू म्हटलं.   भूक नव्हती  पण न  खाता झोपणं सवय नव्हती.  जवळच्या स्टेशनवर सुरेंद्रनगरला पाहू काही घेता आलं तर असं नवरा म्हणाला. पण दुरांतो २ मिनिट फक्त तिकडे थांबते  अशक्य वाटलं. पण आश्चर्य म्हणजे महाराजांनी  परत जातानाची हि पण ईच्छा पुरी केली. समोसे आणि खरी प्याटीस घेऊन नवरा आला. जय गुरुदेव दत्त! एक एक समोसा आणि अर्धा प्याटीस खाऊन झोपलो. 

दुसऱ्या दिवशी ६ वाजता सकाळी (१३ नोव्हेंबर १९) मुंबईला गाडी पोचली. ७ वाजताची इंटरसिटी गाडी पकडून आम्ही पुण्याला आलो.  लोकल पकडून जाऊ आणि नणंद ठाण्याला गेल्या. 

गुरुदेव दत्त! गुरुदेव दत्त!! गुरुदेव दत्त!!!
चदवावं मारुती , लांबे हनुमान देऊळ आणि श्री दत्त पादुका गिरनार 

या पूर्ण यात्रेत अनेक माणसं  भेटली ज्यांचा उल्लेख करायचा राहिला आहे तो असा -
१) दोन काकू भेटल्या. आदल्या  हो घाबरू नका. 
२)जुनागढ चे आजोबा. काश्मिरी बापूक मथ्था  टेक कारही जाओ .
३) ६००० पायरी नंतर चा माणूस. हो गया आपणे  जीत लिया दिल को  भगवान के बस चलते  रहो. सिडीया मत गिनो. 
४) जातानाचा वाहन चालक. भरपूर वजनी होता. उसमे क्या है ? प्रणाम करो चढो. में दो बार हो आय हू. 
५) ७० वर्षीय आजी . ना  बाटली. ना चप्पल. तुरुतुरु धावे. (गरजा मोजक्याच ... महाराज दाखवत होते. )
६) काही अनुभव लिहू शकत नाही ते अनुभवायचे असतात. 

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!!! श्री गुरुदेव दत्त !!!!
आदेश बांदेकर यांच्या पैठणीच्या मालिके सारखं  "आज आभार मानाल? आणि क्षमा कोणाची ?  असा मी स्वतःला विचारलं. आभार मानल्या शिवाय काहीच शक्य नाही. 
आभार मान्यचेत ते -
१) माझ्यातल्या परमेश्वराचे ज्यानं हि ईच्छा निर्माण केली. 
२) माझ्या नवऱ्याचे ज्यानं प्रत्येक गोष्टीत सहमती दाखवली. सोबत केली. 
३) दादा वाहिनीचे. गिरनारच्या पोचण्यापर्यंत काय कसं करायचं  याचं मार्गदर्शन केलं. 
४) गिरीश  काकांचे आभार आमचं राहण्याचं बुकिंग केलं .
५) दादांच्या स्नेह्यांचे भावेन दादा वाहिनीचे. 
६) जुनागढ ते राजकोट वाहन चालकाचे वीरपूर साठी. 
७) दंडवते काकू आणि जोशी दाम्पत्य अनुभव सांगून मनाला दिलासा दिला यासाठी. 
८) आई / सासूबाईंचे आभार. घरची काळजी नाही. त्यांच्या  असण्यानं मुलाची चिंता नव्हती. शांत मनाने यात्रा करू शकले. 

सर्वात महत्वाचं आणि पाहिलं  श्री दत्त  गुरूंचे आभार, सगळ्याच साठी. तसेच माझ्या  सहकाऱ्यांचे सुद्धा साथी  साठी. 

मी  आपली आभारी आहे. 
क्षमा मागायची ती -
१) चढताना अनवधानानं किडा मुंगीस ठेच लागली  असल्यास. 
२) पूर्ण यात्रेत अनवधानानं कोणास दुखावलं असल्यास त्याची. 

श्री गुरुदेव दत्त!
शुभम भवतु!
सौ. गौरी अनिरुद्ध पाठक